अविनाशी | कवि देवगढ़वी नानाकपाया
*अविनाशी*
_भटक भटक रहे उदासी_
_ऐसे नहीं मिले अविनाशी_
_मन के ही द्वार को खोलो_
_बाहर नहीं घट भीतर डोलो_
_ज्ञान में डुबकी लगाओ_
_भागीरथी है अंदर जाओ_
_दृष्टि से तु पर हो जावे_
_तब हरि दर्शन हो जावे_
*✍🏻 देव गढ़वी, नाना कपाया, मुंद्रा, कच्छ*
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