संभल जाऊंगा
*चोट दिल पे लगी है,ठहर जाऊंगा*
*ये बात और है,अब संभल जाऊंगा*
*तुमने वो किया जो करना था तुम्हे*
*में कोई कुंआ नहीं,जो छलक जाऊंगा*
*क्या हुआ जो डूबा,साहिल पर आकर?*
*आहिस्ता आहिस्ता सही,उभर जाऊंगा*
*गिरा हु ऊँचे मीनारों से,कोई बात नहीं*
*खाक बनते ही,अर्श को छू जाऊंगा*
✍🏻देव गढवी
नाना कपाया,मुंद्रा
कच्छ
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