ठहर जाऊँगा - कवि देव गढ़वी नाना कपाया

_चोट दिल पे लगी है,ठहर जाऊंगा_

_ये बात और है,अब संभल जाऊंगा_


_तुमने वो किया जो करना था तुम्हे_

_में कोई कुंआ नहीं,जो छलक जाऊंगा_


_क्या हुआ जो डूबा,साहिल पर आकर?_

_आहिस्ता आहिस्ता सही,उभर जाऊंगा_


_गिरा हु ऊँचे मीनारों से,कोई बात नहीं_

_खाक बनते ही,अर्श को छू जाऊंगा_


✍🏻देव गढवी

नाना कपाया,मुंद्रा कच्छ


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