सो रहा है - કવિ દેવ ગઢવી નાના કપાયા

 *सो रहा है*

आँखे जाग रही है ईंन्सान सो रहा है

जुबां है खामोश ये निगहेबां सो रहा है

चाहे जितनी तुम लुंट चलालो यहां पर
महेमान बना घर में मेजबान सो रहा है

छोटे-छोटे टुकडों में बांट देंगे देश को
क्युंकी देश चुपसा बैजुबान सो रहा है

क्या ईनसे उम्मीद के ईंन्कलाब लायेंगे
शहर का शहर जैसे कब्रिस्तान सो रहा है

कभी तो शर्म आती होगी शिसा देखके?
के ईमान के पर्दे में बेईमान सो रहा है

दीमक चाट रही है दीवार ईमारत की 'देव"
वो स्तभों के भरोसे मकान सो रहा है

✍🏻देव गढवी
नानाकपाया-मुंदरा
        कच्छ

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